Tuesday, November 13, 2007

गज़ल!

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कोशिश तो करेंगें तुम न याद आओ,
दिल ही अगर साथ न दे तो क्या करें ।

तुमने की थी ज़फा या थी मजबूरियाँ,
अपनी किस्मत हो ऐसी तो क्या करें ।

हम तो हरदम ही रस्ते भटकते रहे,
मंजिल छू के निकल जाये तो क्या करें ।

शाम आखिर तो आनी थी जिंदगी की कभी,
बादल दिन में जो घिर आयें तो क्या करें ।

रास्ते तुमने ज़ुदा हमसे कर तो लिये,
मोड़ खुद से ही मिल जायें तो क्या करें ।

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