Friday, November 23, 2007

ग़जल!

बिसरा दोगे तुम हमें, ये तो यकीं था,
जल्दी भुला दोगे इतना, किसको यकीं था ।

ग़र धूप न निकले तो बादल को मिले दोष,
मौसम को तो नाम कोई देता नहीं था ।

वादे तुम्हारे तो बस निकलीं थी बातें हीं,
जो मुँह पे तेरे था, वो दिल में नहीं था ।

पहली मुलाकात में थी जो गर्मजोशी,
मतलब निकलने के बाद उसका नाम नहीं था ।

बीता है ज़माना मिलते हुए बेवफाओं से,
तुमने जो किया, कुछ अलग तो नहीं था ।

2 comments:

बालकिशन said...

एक और शानदार गजल के लिए आपको धन्यवाद. इस उर्जा, इस चिंतन का स्रोत्र क्या है सर?

डॉ० अनिल चड्डा said...

कवि ह्रदय जो भी महसूस करता है उसे शब्दों में ढ़ालने की कोशिश करता है । इसलिये स्रोत ढूंढना तो कठिन है । परन्तु यदि आप जैसे प्रशंसा करने वाले मिलते रहे तो शायद और भी अच्छी कृति दे पाऊँ ।

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