Wednesday, November 28, 2007

गज़ल!

बड़ी छोटी रही तेरे ख्वाबों की रात,
आँख फिर से लगे तो बने कोई बात ।

दिल ने दिल से था वादा किया बार-बार,
ग़र मिल जायें वो अपनी कह दूंगा बात ।

सोचता ही रहा, देखता ही रहा,
उनके आने से भूला था सारी मैं बात ।

फिर से बुनने लगा ताने-बाने ये दिल,
ख्वाब में उनसे सारी कह लूँगा मैं बात ।

नींद आये अगर, ख्वाब आयें मुझे,
करवटें लेते थी कट जाती सारी ही रात ।

यूँ तड़पता नहीं, यूँ मचलता नहीं,
दिल ने मानी जो होती कभी मेरी बात ।

2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

सीधे साधे शब्दों में दिल की बात हर शेर में.
बहुत उम्दा लिखा है आपने.
बधाई
नीरज

डॉ० अनिल चड्डा said...

धन्यवाद नीरज जी!

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